khabarspecial/Toilet: Ek Prem Katha Review {4/5}: This film is a satirical take on the age-old, tradition of seeking fields to relieve ourselves,मूवी रिव्यू - टॉयलेट: एक प्रेम कथा

मुंबई/एंटरटेनमेंट: जबसे मार्केट में आया, फ़िल्म का नाम ही मज़ाक का केंद्र बना हुआ था – टॉयलेट: एक प्रेम कथा. ससुरी टॉयलेट में क्या प्रेम कथा होनी थी, ये देखने जाना पड़ा.

हालांकि ट्रेलर देख के मामला समझ में आ गया था लेकिन चूंकि मैं ‘फ्रीकी अली’ और ‘सुसाइड स्क्वॉड’ का भुक्तभोगी हूं इसलिए अब ट्रेलर देख कर ही फ़िल्म को अच्छा या बुरा कहने में विश्वास नहीं रखता. ट्रेलर अपनी जगह, पिच्चर अपनी जगह.

ट्रेलर को देखकर मालूम चल गया था कि मामला क्या है. लेकिन चूंकि ढाई घंटे लम्बी फ़िल्म थी इसलिए ड्रामा तो होना ही था. अक्षय कुमारयानी केशव और भूमि पेडनेकर यानी जया की प्रेम कथा.

CAST: Akshay Kumar, Bhumi Pednekar, Divyendu, Sudhir Pandey, Anupam Kher
DIRECTION: Shree Narayan Singh
GENRE: Drama
DURATION: 2 hours 41 minutes
CRITIC’S RATING: 4.0/5

 

विलेन – शौच और सोच. वही विद्या बालन का पुराना वाला सरकारी ऐड – ‘जहां सोच वहां शौचालय’. उसी ऐड को फैला के रख दिया है और एक पिच्चर बना दी है.

कहानी है नंदगांव की. मथुरा के पास. एक ऐसा इलाका जहां मोबाइल क्रांति बस अभी ही आई है. डिश टीवी का बोलबाला है. सनी लियोनी डिमांड में हैं. गांव के बुढ़ऊ के दिन की शुरुआत भी टीवी पर ‘बेबी डॉल मैं सोने दी’ से होती है.

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ऐसे में एक महा-आवारा और छिछोरा लड़का जिसके पास एक मोटरसाइकिल और एक साइकिल की दुकान है, एक लड़की का पीछा करने लगता है.

बॉलीवुड में इसे ‘प्यार’ कहा जाता है. वो उसका पीछा करता है. मोबाइल से फ़ोटो खींचता रहता है. मर्ज़ी आती है तो वीडियो बना लेता है. आते-जाते मिलता रहता है.

फिर एक दिन लड़की उसे लताड़ती है तो पपी फ़ेस बनाकर कट लेता है. ये कहते हुए कि ‘मैंने तुम्हें उस नज़र से नहीं देखा और प्यार सच्चा किया है.’ लड़की गिल्ल हो जाती है.

लड़का गुस्सा होने का नाटक करता है और लड़की उसे मनाने पहुंचती है. उसी इलाके की शब्दावली में, ‘सेटिंग’ हो जाती है. एकदम 80-90 का बॉलीवुड.

जिन बातों पर ऐसे लड़कों पर ‘शोहदे’ का तमगा लग जाता है, अखबार में फ़ोटो छपती है, उन बातों को स्क्रीन पर करने वाले को ‘हीरो’ का दर्जा मिल जाता है.

लड़की की शादी हो जाती है. उसी पीछा करने वाले लड़के से. लड़की घर में आती है और उसे आते ही दो बातें पता चलती हैं:

1. ये लड़के की पहली शादी नहीं थी. इससे पहले उसकी शादी एक भैंस से करवाई गई थी क्यूंकि लड़का मांगलिक था.
2. घर में टट्टी करने को कोई जगह नहीं है. हलके होने के लिए बाहर जाना होगा.

पहली वाली बात तो हंसी-ठिठोली में निकल गई. लेकिन गरारी दूसरे वाले पॉइंट पर अटक गई. घर में संडास नहीं था. नई बहू को लोटा लेकर गांव की बाकी औरतों के साथ दिशा-मैदान जाना था.

बहू पढ़ी-लिखी थी. संस्कार और तमीज़ नाम की चीजें विज्ञान की किताबों के नीचे दबा के रख दी थीं. उसने विद्रोह कर दिया. घर वापस चली गई. आगे का नहीं बताऊंगा.

फ़िल्म में कुछ बातें हैं जो बहुत ही अच्छी लगती हैं. फ़िल्म डायरेक्टर श्री नारायण सिंह ने एक छोटे कस्बे की आत्मा को जिला दिया है. ये शायद नीरज पांडे की सोहबत का असर हो सकता है. श्री नारायण ने इससे पहले नीरज पांडे की ‘स्पेशल 26’, ‘बेबी’ और ‘एमएस धोनी’ को एडिट किया है.

इन फिल्मों में कैरेक्टर के इतर सभी बातों को और आस पास के माहौल को बेहतरीन तरीके से दिखाया है. इस फ़िल्म के प्रोड्यूसर भी अक्षय कुमार के साथ नीरज पांडे ही हैं. एक छोटे कस्बे के लफंडर केशव की लफंडरी दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई है.

गॉगल्स के नाम पर सस्ते, सेकंड कॉपी और बड़े चश्मे, बड़े ब्रांड्स के नाम बदलकर मिलते जुलते नाम वाली टीशर्ट्स, मोबाइल पर धड़ल्ले से चलते वीडियो एक बढ़िया माहौल बना कर रखते हैं. लखनऊ, कानपुर सीतापुर, हरदोई, फैज़ाबाद सरीखी जगहों से आने वाले लोग बराबर कनेक्ट करेंगे.

ये फ़िल्म बननी ज़रूरी थी. वैसे तो इस फ़िल्म को नकारने वाले ये कह रहे हैं कि ये एक ढाई घंटे लंबा सरकारी ऐड मात्र है लेकिन टीवी पर आने वाले एक ऐड की अपनी रेंज होती है. वो उस रेंज को नहीं पकड़ पाता जिस रेंज को फ़िल्म पकड़ सकती है.

मसलन एक ऐड में ये नहीं दिखाया जा सकता कि खेत में हल्की होने बैठी औरतों पर एक ट्रैक्टर वाला ज़बरदस्ती उन पर लाइट मार के चला जाता है. एक ऐड में इतनी स्ट्रांग लैंग्वेज नहीं इस्तेमाल की जा सकती जितनी एक फ़िल्म में की जा सकती है.

जितनी इस फ़िल्म में की गई है. इस फ़िल्म में कई जगह पर ऐसी बातें कही गई हैं जो आपको असहज कर देंगी, लेकिन वो ज़रूरी मालूम देती हैं.

इसके साथ जो शायद सबसे बड़ी बात की गई वो है धर्म और संस्कृति के नाम पर चल रही बेवकूफ़ियों के बारे में खुल कर बोला गया है. केशव को एक ब्राह्मण घर का लड़का दिखाया गया है और इसके बारे में कम से कम उतनी खुलकर बात ज़रूर की गई है जितनी खुली बातें अभी तक फ़िल्मों में धर्म और जाति के बारे में नहीं की जाती थीं.

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एक लड़के की गाय से शादी, एक बाप का उस आंगन में संडास न बनवाने का हठ जिसमें तुलसी लगती है, गांव के सरपंच का मनुस्मृति से अपने फायदे के लिए उठाये आधे श्लोक और उसके पीछे की मंशा को जमकर लथेड़ा गया है.

लेकिन समस्या उस जगह आकर खड़ी हो जाती है जहां इस फ़िल्म में एक एजेंडा दिखाई देने लगता है. फ़िल्म की शुरुआत में एक कैप्शन के ज़रिये नरेंद्र मोदी की तुलना गांधी जी से कर दी जाती है. मुद्दे की बात, देश में सफ़ाई की बात गायब रहती है.

फ़िल्म में एक जगह पर उत्तर प्रदेश का चीफ़ मिनिस्टर मोदी जी की नोटबंदी की तारीफ़ करता हुआ दिखाई देता है. ये एकदम वैसा ही लगता है जैसे बिरयानी खाते-खाते मुंह में खड़ी इलायची आ गई हो. इलायची ज़रूरी होती है मगर इस शर्त पर नहीं कि वो चबाने में आ जाए.

फ़िल्म में ड्रामा पर ज़्यादा और फैक्ट्स पर कम जोर दिया गया है. सरकारी लचर काम को दिखाने के जो स्कैम्स दिखाए गए हैं वो भी चार साल पुराने हैं.

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चार साल में कितनी प्रोग्रेस हुई या मोदी सरकार बनने के बाद इसके बारे में काम क्यूं नहीं हुआ, इस बारे में कोई बात नहीं हुई.

ऐसा ही दिखाया गया कि मोदी सरकार आने के बाद टॉयलेट बनाये जाने के बारे में जितनी भी योजनाएं आईं उनमें किसी भी तरह का कोई दोष नहीं था, उनमें कोई भी कोताही नहीं बरती गई और सब कुछ बढ़िया जा रहा है.

इसके अलावा बचता है बॉलीवुड को लगा लड़के से लड़की का पीछा करवा कर उसे प्यार का नाम दे देने वाला रोग. इस रोग से हिंदी फ़िल्में कब मुक्त होंगीं, इसका इंतज़ार है.

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फ़िल्म कुल मिला के अपने केंद्र में वजनी है लेकिन बाकी मामलों में बहुत हल्की है. फ़िल्म बननी चाहिए लेकिन और भी ज़्यादा नक्काशी कर दी जाती, रिफाइन कर दी जाती तो बेहतर होता.

ढाई घंटे बैठने में कई जगह जम्हाई आती है. फ़ोन निकालकर मेसेज-वेसेज करने का मन करता है. बाकी सब ठीक ही है. अक्षय कुमार अगले मनोज कुमार कहलाए जाने की दहलीज पर बस खड़े हैं. बाकी सब ठीक ही है.